।। श्री गणेशाय नमः ।।
सत्यनाराण कथा हिन्दी पदानुवाद-1
समर्पण
अध्याय -1
दोहा
अक्षर देव गणपति नमन, सदा रहो अनुकूल ।
शब्द भाव उर में भरो, मेटो मेरी भूल ।।
स्तुति (गीतिका छंद)
सत्यनारायण प्रभो हे, वास हो उर आपका ।
कर सुदर्शन चक्र सोहे, शंख सोहे अरू गदा ।।
मेघ सम शुभ वर्ण सोहे, शांत चित सागर शयन ।
हे रमा पति विश्व भर्ता, विष्णु प्रभु भव भय हरण ।।
दोहा
सत्य नारायण निज उर, सादर मन बैठाय ।
दिव्य कथा प्रारंभ करुॅं, श्रवण करो मन लाय ।।
कलियुग बेला पूर्व ही, होने लगे क्षय धर्म ।
नारद के कोमल हृदय, समझे मानव मर्म ।।
स्कन्दे रेवा खण्ड में, कथा कही है सार ।
मन वांछित फल देत हैं, सत्य देव कलिकाल।।
छन्द बद्ध पहले किये, वेदव्यास भगवान ।
शौनकादि सम्मुख प्रथम, कहे सूत श्रीमान ।।
चौपाई
नैमिष कानन धाम सुहावन। धरा मध्य है पाप नशावन
चक्र तीर्थ है जग विख्याता। नीर धरा वृत सम बलखाता
द्वापर युग रहे अंतिम चरण। नर भटके तज कर धर्म शरण
परम रम्य अति आश्रम पावन। शौनकादि मुनि वास सुहावन
सूत ज्ञान निधि पुनि तहॅं आये । बहु विधि पूजत मुनि बैठाये
करि पूजा कहि आरत बानी । प्रेम सुधा अंतर मन सानी
होहिं पाप कलयुग भयकारी । पूजा तप त्यागहिं नर नारी
करहिं दुष्टता बहुत प्रकारा । होहिं क्लेश तब कष्ट संसारा
किस विधि होही सज्जन रखवारी। कहहु नाथ प्रभु आप विचारी
व्रत तप पूजा किस विधि करहीं । किस विधि नर भव सागर तरहीं
दोहा
धन्य धन्य अति धन्य तुम, सुन विनती कह सूत ।
परहित काज विशेष है, करे इसे सत पूत ।। 1।।
चौपाई
यही प्रश्नप्रश्न नारद इक बारा । श्री हरि सन्मुख कहे पुकारा
नारद वचन द्रवित भगवंता । श्रीमुख निसृत कथा यह संता
सोइ कथा मैं करँउ बखाना । निज उर धरि कमलापति ध्याना
शांत चित्त शुभ मन अरु बानी। करें श्रवण यह कथा सुहानी
जनहित की मंगल अभिलाषा। वीणा नारायण कर भाषा
लोक लोक जग संसारा। नारद मुनि विचरत इक बारा
मृत्युलोक वह जाये पहुँचे । दीन हीन जन देखे उहँचे
विविध क्लेश पीड़ित सब लोगा । देख दशा नारद मन छोभा
जीव धरे है नाना योनी । क्लेश मिटे न अपि वृद्धि होनी
भोग रहे पापी जीव सभी । नारद उर उपजे दया तभी
किस विधि यह सब मिटे कलेशा । मनन करते नारद मुनेषा
पहुँचे जगतपिता के लोका । मन उदास मुख मुखरित शोका
दोहा
शुक्ल वर्ण प्रभु चतुर्भुज, जिनके गर वनमाल ।
शंख चक्र अरु गदा ले, सोहे दीन दयाल ।।
करुणाकर के कमल पद , नारद नाये माथ ।
नाना विधि वह स्तुति किए, प्रेम भाव के साथ ।।
गंगोदक सवैया
हे प्रभो आदि भी अंत भी आप हो, दृश्य हो हो निराकार भी आप हो ।
हो परे बुद्धि से विश्व व्यापी प्रभो, जीव निर्जीव में व्याप्त तो आप हो ।।
व्याप्त हो पंचभूत में प्राण हो, शक्ति में शक्ति का मान भी आप हो।
दीन के नाथ हो भक्त के साथ हो, आसरा के प्रभो आसरा आप हो।।
दोहा
नारद आरत वचन सुनि, द्रवित हुए भगवंत।
केही कारण आगमन, आज भये श्री संत ।।
चौपाई
पूछउँ नारद मन कर बाता । मिलहिं उत्तर निश्चित ताता
मृत्युलोक क्यों जीव दुखारी । कारन कवन कोई न सुखारी
जीव भटक कर नाना योनी। बहु विधि दुख भोगत निज होनी
होहिं केहिं विधि प्रभु कष्ट क्षरण । होहिं केहिं विधि सब जीव तरण
कहहु रीति लघु अंतरयामी । दीन हीन भक्तों के स्वामी
जिस विधि सज्जन होंय सुखारी । कृपा करहु प्रभु दशा विचारी
नारद वचन सुनी भगवाना । मुनि सन बोले कृपा निधाना
धन्य तात तुम धन्यहि बहुता। पूछे जो यह प्रश्न पुनीता
एक व्रत है दुर्लभ इह लोका । मेटहिं जो प्राणी कर शोका
मोह मुक्त हो प्राणी तरहीं । पुण्य व्रत यह जो जन करहीं
दोहा
सुन कर नारद प्रभु वचन, पूछे व्रत विधान।
भक्त व्रत किस काल करे, कौन किये हैं मान ।।
चौपाई
व्रत सत्यनारायण सम नहिं । और व्रता दूजा जग पर कहिं
सकल क्लेश के नाशनहारी । भाग्य विधाता मंगलकारी
शत्रु विनाशक मंगल दाता । बांझ गोद संतान खिलाता
सकल मनोरथ के यह दाता । सत्य देव ही सत्य कहाता
आशा श्रद्धा विश्वास धरे । धर्म हेतु यह व्रत कर्म करे
जब तब हो इच्छा मन माही । कछुक दिवस वह निश्चित पाही
सकल बंधु बांधव द्विज सहिता । राग द्वेष तज कपट रहिता
कदली पर्ण वितान बनावें। तोरण पंच पल्लव सजावें
सप्तधान्य पर कलश सवारें। यथा शक्ति पंच रत्न वारें
मण्डप को बहु भांति सवाँरें । फूल सुगंधी उस पर डारें
दोहा
गौरी गणेश भाव से, नवग्रह सहित बिठाय ।
विष्णु जी की प्रतिमा ले, आसन देव लगाय ।।
चौपाई
सांझ काल को पूजन करना । अपने उर प्रभु मूरत धरना
सुमन सुवासित दूर्वा लेकर । धूप दीप अरु चंदन देकर
यथा शक्ति कदली फल मेवा। भेंट करें प्रभु को निज सेवा
घृत शक्कर मधु अरु दुग्ध दही। बने पंचामृत यही सही
गेहूँ साठी चूर्ण सवाई। गुड़ या शक्कर संग मिलाई
उत्तम कोटि प्रसाद बनायें। प्रेम भाव से देव चढ़ायें
परिजन मिलकर यह कथा सुने। सत्यदेव की वह कृपा गुने
यथा दक्षिण द्विजहि दीजिये । फिर प्रभु प्रसाद ग्रहण कीजिये
अंत ब्राहमण भोज करावें। नाना मंगल वाद बजावें
इसी रीति व्रत पूर्ण करावें। इष्ट सिद्धि ले भाग्य सजावें
भू पर उत्तम यह व्रत पूजा । कलयुग आन उपाय न दूजा
कथा नाम से इसे जानते । सत्यदेव को सत्य मानते
दोहा
मृत्युलोक कलिकाल में, यहि लघु रीति विशेष ।
देव कृपा विश्वास से, निश्चित मिटहीं क्लेश ।।
।। सत्यनारायण स्वामी की जय।।
।। कथामृत प्रथम अध्याय समाप्त।।

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