भगवान सत्यनारायण की आरती एवं क्षमा प्रार्थना
आरती
ओम् जय सत्यदेव नारायण । स्वामी जय सत्य देव नारायण
सकल चराचर करत, सकल चराचर करत,
नित तेरी यश गायन ।। ओम् जय सत्यदेव नारायण
तेरी महिमा गावे, नारद वीणा धारी। स्वामी नारद वीणा धारी
देव मनुज सब जाते,देव मनुज सब जाते,
प्रभु तेरो बलिहारी ।। ओम् जय सत्यदेव नारायण
क्षीर सागर शयन, शेष नाग सैय्या। स्वामी शेष नाग सैय्या
लक्ष्मी माता सेवत, नित तेरो पैय्या ।। ओम् जय सत्यदेव नारायण
शंख चक्र सोहत, और सोहे गदा। स्वामी और सोहे गदा
छवि आनंद भरे, भक्तों के उर सदा ।। ओम् जय सत्यदेव नारायण
भक्तों के कारण, नाना रूप धरे। स्वामी नाना रूप धरे
चारों युग चारों काल, भूमि भार हरे ।। ओम् जय सत्यदेव नारायण
घोर कलिकाल में, भक्तों से कर प्रीति। स्वामी भक्तों से कर प्रीति
सत्यनारायण कथा यह, दिये अति दिये लघु रीति ।। ओम् जय सत्यदेव नारायण
बांझ को संतान देत, निर्धन को माया। स्वामी निर्धन को माया
हर भक्तों पर करते, प्रभु तुम तो दाया ।। ओम् जय सत्यदेव नारायण
कदलीपर्ण मण्ड़प मध्य, प्रभु तुम बिराजे। स्वामी प्रभु तुम बिराजे
श्रद्धा आदर सहित, भक्त तुम्हे साजे ।। ओम् जय सत्यदेव नारायण
गेहूं साठी चूर्ण के, प्रसाद चढ़े सवायो । स्वामी प्रसाद चढ़े सवायो
कदली फल मेवा, प्रभु तुमको है भायो ।। ओम् जय सत्यदेव नारायण
द्विज रूप धर, सतानंद सम्मुख आयो । स्वामी सतानंद सम्मुख आयो
दांड़ीरूप धरकर,साधु को भरमायो ।। ओम् जय सत्यदेव नारायण
नाना रूप धर, भक्तों को हर्षायो । स्वामी भक्तों को हर्षायो
किये जो यह व्रत, उनके कष्मिट मिटायो ।। ओम् जय सत्यदेव नारायण
तेरी यह आरती, जो भक्त गावे । स्वामी जो भक्त गावे
परम सुख भोगकर, सत्यलोक को जावे ।। ओम् जय सत्यदेव नारायण
ओम् जय सत्यदेव नारायण । स्वामी जय सत्य देव नारायण
सकल चराचर करत, सकल चराचर करत,
नित तेरी यश गायन ।। ओम् जय सत्यदेव नारायण
क्षमा प्रार्थना
(अनुष्टुप छंद)
भक्त वत्सल देवा हे, अपराध क्षमा करें ।
मैं तो बाल अज्ञानी हूॅ, शरण अपने धरें ।।
भक्ति पूजा नहीं आवे, दोषों से नाथ मैं भरा ।
तेरी प्रबल माया से, घास समान मैं जरा ।।
मैं हूँ मूरत दोषों का, क्षमा मूरत आप हैं ।
सकल दोष को मेटे, दीनदयाल आप है ।।
लीला अगाध है तेरी, पार पावे न शेष भी ।
वेद पुराण तो देवा, बताये लवलेश ही ।।
भक्ति शक्ति कहां मेरी, जो गाथा गा सकूं भला ।।
मैं मूर्ख खल कामी हूँ, कैसे स्तुति करूं भला ।
जो अपराध हो मेरे, हे देव दूर कीजिये ।
पड़ा चरण तेरे मैं, निज शरण लीजिये ।।

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