सत्‍यनाराण कथा हिन्‍दी पदानुवाद-5

 

सत्‍यनाराण कथा हिन्‍दी पदानुवाद-5



अध्याय -5

स्तुति (भुजंगप्रयात छंद)

हरो नाथ संताप जो हों हमारो।

पड़े पाद तेरे हमें तो उबारो।।

न आवे प्रभो पाठ पूजा तुम्हारे ।

क्षमा नाथ दुष्कर्म सारे विसारे ।।


दोहा

कथा  रसिक  मुनिश्रेष्ठ  सब, कथा सुने मुनि और।

सूत कहे  सनकादि  से,  बैठ  शांत  चित ठौर।।


चौपाई

तुंगध्वज राजा एक रहे । तज प्रभु प्रसाद बहु कष्ट सहे

रहे प्रजा पालक वह राजा । धर्म सहित करते थे काजा


प्रजा पुत्र को एक समाना । वह राजा हर पल ही जाना

एक बार वह करत शिकारा । बहु हिंसक पशु को संघारा


मृगया करते थकान भर आये । बरगद छाया वह सुसताये

वहीं निकट पर ग्‍वाल समाजा । करत रहे व्रत पूजन काजा


बैठ रहे देखत वह राजा । गये न समीप ग्वाल समाजा

किये नहीं वह देव प्रणामा । अहंकार कर भुज बल कामा


राजा करके यह अभिमाना। किए देव का वह अपमाना

यद्यपि वह था ना अभिमानी । होनि प्रबल वह यह ना जानी


गोप-ग्‍वाल प्रभु पूजा करते । प्रभु मूरत को अंतस भरते

उर धर कर श्रद्धा विश्‍वासा । ग्‍वाल करत हैं व्रत उपवासा


विधि पूर्वक सब पूजन कीन्हें । प्रेम सहित प्रभु प्रसाद दीन्‍हें

प्रभु प्रसाद राजा को देने । पूजा कर गोप किये गवने


राजा समीप प्रसाद रख कर । किये नमन राजा को झुक कर

किन्तु मान वह तनिक न दीन्हा । प्रभु प्रसाद ग्रहण नहीं कीन्हा


गोप लौट आये देव चरण  । भाव सहित करते भोग ग्रहण

भोग त्‍याग कर जब वह  राजा । आये अपने राज समाजा


दोहा

राजा निज  घर  लौट  के,  देख  रहे  भौचक्क।

नष्ट हुये सौ पुत्र सब, गया हृदय तब धक्क।।


चौपाई

सकल संपदा राज समाजा। नष्ट भये देखे वह राजा

मन ही मन वह विचार कीन्‍हा । निश्चित ही प्रभु यह फल दीन्हा


सत्यदेव की महिमा माना । उसी स्‍थल को चाहे जाना

मन यह विचार कर वह राजा । गये जहां थे गोप समाजा


साथ बुलाये वह ग्वाल सभी । व्रत पूजन फिर वह किये तभी

भक्ति सहित वह  देव मनाये । सारे निज दुख क्लेश बताये


सत्यदेव प्रभु तब कृपा किये । सकल संपदा अरु पुत्र दिये

मृत्युलोक सब सुख भोग करे । अंत समय वह सतलोक वरे


कथा सत्यनारायण की यह । अति दुर्लभ पावन धरनी तह

कहे सूत यह पाप नशावन ।  पुण्यमयी अति पुनीत पावन


दोहा

सत्यदेव  व्रत  को  करें,  ले  श्रद्धा  विश्वास।

सकल  मनोरथ  पूर्ण  कर,  प्रभु  मेटे  भव  त्रास ।। 


चौपाई

जो नर यह व्रत पूजन करहीं । निश्चय ही भव सागर तरहीं

दीनों की दीनता मिटाये  ।  प्रभु बांझन  के गोद खिलाये


भव बंधन तोड़े हैं ऐसे ।  तिनके को तोड़े है जैसे

बलहीनो को बल के दाता । सूत कहे यह निश्चित  बाता


इस जग में इच्छित फल पावे । अंतकाल वह सुरपुर जावे

सूत विप्र सन बात बताये । प्रभु की महिमा जगत समाये


कलयुग में विशेष फल दाता । नाना नामों से विख्याता

काल सत्य कोई ईश कहे । सत्यदेव प्रभु के चरण गहे


नाम सत्यनारायण सोई । नाना रूप धर ही प्रभु जोई

सकल मनोरथ पूरन कारी । सत्यदेव जन मन हितकारी


पढ़े सुने जो नर देव कथा । प्रभु मेटे उनकी सभी व्यथा

उनके सारे पाप नशाये । जो नर प्रभु पद हृदय बिठाये


दोहा

पूर्वकाल  में  भक्त  जो, किये  कथा उपवास।

अपने  अगले  जन्म  में,  बने देव की दास।। 


चौपाई

सतानंद थे जिनके नामा । अग्र जन्म वह भये सुदामा 

कृष्ण मित्र वह जग विख्‍याता । पावन भक्ति कृष्‍ण का पाता


निर्धन वह भिल्ल लकड़हारा । गुहा नाम जाने संसारा

जो श्री रामहिं चरण पखारे। जब गंगा तट राम पधारे



उल्कामुख नामित वह राजा । भये अयोध्‍यापुर के राजा

रंगनाथ की पूजन कीन्हा । परम मोक्ष पद को वह लीन्हा


साधु नाम का वणिक महाजन । हुये वही मोरध्वज राजन

अपने सुत को काटे आरा । अखिल विश्व का दानी प्‍यारा


तुंगध्वज नामित राजा जनु । होय वही तो स्वायम्भुव मनु 

सकल कर्म भगवत का कीन्हा । विष्णुलोक प्रभु उसको  दीन्हा 


दोहा

गोप  ग्वाल  थे  भक्त  जो,  बने  गोप  व्रजधाम ।

कृष्ण  सखा  बन  वो  करे,  सत्‍यलोक विश्राम ।। 


।।सत्यनारायण स्वामी की जय।।

।। कथामृत पंचम अध्याय समाप्त।।


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