सत्‍यनाराण कथा हिन्‍दी पदानुवाद-3

 

सत्‍यनाराण कथा हिन्‍दी पदानुवाद-3



अध्याय -3


स्तुति (त्रिभंगी छंद) 

हे आदि अनंता, श्री भगवंता, जन सुख दायक, दास करें ।

हे द्विज रूप धारी, छवि चित हारी, मेरे मन में, वास करें ।।

उल्कामुख राजा, भक्त समाजा, पूरन काजा, आप लहें ।

सुन विनती मोरी, मैं मति भोरी, चरण पड़ा हूँ, मुझे गहें।।


दोहा

नैमिषारण्य   धाम   में,   कथा  कहे श्री   सूत ।

पूर्व    कथा    इतनी   भई,   आगे   के   लें   सूध ।।


चौपाई

पूर्वकाल उल्कामुख  राजा । सुख सह करते अपने काजा

सतभाषी वह   इंद्रिय   जेता ।  धर्मपरायण   पत्नि   समेता


प्रतिदिन  वह देवालय जाये । करि  प्रभु  पूजन  मन हर्षाये

विप्र दक्षिणा बहु विधि देते । निर्धनता उनके हर लेते


धर्म पत्नि शीलविनय नामा । जिनकी काया कमल समाना

चरित रूप गुण उत्तम  वाणी । पतिव्रता थी नार सुजानी


इक दिन वह उल्कामुख राजा । भार्या सह पूजन कर काजा

 नदी भद्रशीला  तट जाकर । रम्य सुहावन निरजन पाकर


मण्‍डप साजे भद्रा रेता । किये कथा व्रत नियम समेता

भक्ति भाव निज अंतस धारे । धूप दीप नैवेद्य वारे


तेहि क्षण वाणिक व्यापारी । नाव भद्रशीला तट डारी

साधु नाम का वह व्यापारी । काम दाम का था पूजारी


पूजन रत वह राजा को देखे । निकट पहुँच निज नयन समेखे

सादर वह राजा से पूछे  । का अरु केहि हेतु यह पूजे


सोरठा

कहिए राजन आप,  है पूजन किस देव की ।

सुनने की अभिलाष, तन्मय होकर जो किए ।। 


संतति की है चाह, है सत्‍यदेव की यह कथा।

प्रभु की दया अथाह, बोले राजा साधु सन।। 


चौपाई

राजा का यह उत्तर पाकर । करे निवेदन माथ झुका कर

मैं भी हूॅ संतान विहीना। कहिए विधि हे सकल प्रवीना


व्रत विधि राजन सकल बताये । चले साधु प्रभु निज चित लाये

सोचत हर्षत घर को आये । निज भार्या सब बात बताये


जब भी होही हमको संतति । करिबो व्रत कथा लीलावती

 लीलावती साधु की नारी । रहती नित पति अनुहारी


पंचदिवस ऋतुकाल निभाये । पति सहचर वह साथ बिताये

 पति पत्नी प्रीत रंग गहरे । ईश्वर दया गर्भ तब ठहरे 


साधु दया ईश्‍वर की जाने । धन्‍य-धन्‍य अपने को माने

खुश थी लीलावती विजन्‍या । नियत समय पर पाई कन्‍या  


लीलावती साधु मन लाये । कलावती तब नाम धराये

गोद उठाये माने धन्या । शुक्ल चन्द्र सम बढ़ती कन्या


सोरठा

बोल रही है बोल,   पति प्रति वह   लीलावती ।

 हृदय  पटल लें  खोल,  सत्य   देव   का  व्रत करें ।। 


दोहा

प्रिया  वचन   सुन   साधु  वह,   बोले   मीठे   बैन ।

कथा करेंगे परिणय समय,   रखो अभी तुम    चैन ।। 


चौपाई

पत्‍नी को वह बात रिझाये । नाना विधि से फिर समझाये

करने व्यापार साधु जाये । नगर-नगर व्यापार बढ़ाये


साधु मगन अपने काम उधर । कलावती बढ़ने लगी इधर 

चढ़ते ज्‍यों रवि की त्‍योरी । कलावती शिशु  भये किशोरी


कलावती वह बाला दिन भर । सखियां संग खेलती मन भर

चंचल चितवन रूप सुहानी । कलावती अब भई सयानी


कछु दिन बाद साधु घर आये । बेटी देख बहुत हर्षाये

कन्या देखी मन अनुमाना । भये विवाह योग्य वह जाना


करि विचार वह दूत बुलाये  । सुंदर वर वह ढूंढ़न पठाये

गॉंव नगर वह दूत चले अब। पहुँचे कांचनपुर नगरी जब


एक वैश्य सुत तहँ वह पाये । देख रूप गुण अति हर्षाये

साथ उसे ले नगर सिधाये । देख उसे सबके मन भाये


वैश्य विलोकत साधु विचारे । योग्य यथोचित है गुण सारे

परिजन बांधव सकल हँकारे । उनके परिणय काज सँवारे


दोहा

कन्‍या परिणय के समय , व्रत विसरे वह साधु।

प्रभु उनके इस भूल से, रुष्ट भये हैं आजु ।। 


चौपाई

दिवस गये जब तो दिन चारी । चले काम में वह व्‍यापारी

दक्ष काम में है वह अपने । व्रत कथा याद किये न सपने


रत्नसार पुर इक रम्य पुरी । सागर तट से कुछु ही दूरी

साथ जमाता करत व्‍यापारा। प्रभुहिं काज वह मनहुँ विसारा


चन्द्रकेतु के नगर मझारा  । जबहिं साधु व्‍यापार पसारा

भ्रष्ट प्रतिज्ञ प्रभु उसे जाना । उसे ताड़ने को मन ठाना


प्रभु इच्‍छा से काल नशाय । एक चोर तहँ उस दिन आये

वह राजा के धन चोरी कर । भाग रहा था सैनिक के डर


सैनिक समीप जब वह देखा । चोरी धन साधु समीप फेका

होनी प्रबल खेले खेला । चोरी धन जब चोरहिं मेला


तेहिं समय वे सैनिक पहुँचे । राज धान्य देखी बहु हर्षे

उन दोनों को चोर मान कर  । पकड़ लिए तलवार तान कर 


दोहा

सैनिक  राजा   से   कहे,   नाथ    रहें    ये   चोर ।

प्रभु    महराजा    दीजिये,    दण्ड    इन्हें    कठोर ।।

चौपाई

सत्यदेव के श्राप प्रभावा । साधु दलिल राजा ना भावा

छिने साधु के धन बलकारी । कारावास सख्त दे डारी


प्रभु माया है अति भयकारी । भार्या भवन होवे दुखारी

घर का धन चोर चुराये । लीलावती क्‍लेश अति पाये


मां बेटी  दरिद्र रुग्ण  हुये । सोच रहीं अब कैसे जीये

भटक रहीं हैं दोनों दर दर । लगे क्षुधा तृष्‍णा से मर मर


एक दिवस भूखी कलावती । एक विप्र घर  जाये पहुँची 

देख जहां सत्यदेव पूजन । करने लगी वहीं कथा श्रवण


मन ही मन वह देव मनाएं । मांगी वर सब हाल सुनाएं

प्रसाद सेवन कर कलावती । रात्रि प्रहर घर जाये पहुँची


माता देखी बेटी आये । प्रेम सहित पूछे वह जाये

केहि हेतु तुम विलंब कीन्ही । अंतर भाव स्पष्ट कर दीन्ही


दोहा

एक   विप्र   घर   देख   के,   सत्यदेव   का   व्रत ।

सुन  रही  थी  बैठ   कथा,   मात   बात   यह  सत्त ।। 


चौपाई

देखा मां एक व्रत अनूपा । सकल मनोरथ दे सुरभूपा

बेटी की यह उत्तर सुनकर । कलावती हृदय में गुनकर


मन ही मन वह किन्‍ह विचारा ।करब पूजन हम विधि अनुसारा

सत्‍यदेव की कृपा विशेषा । बचे मनोरथ फिर क्‍यो शेषा


मॉं-बेटी परिजन बुलवाये । सत्‍यदेव की कथा कहाये

भक्ति भाव से पूजन कीन्ही । और दक्षिणा द्विज को दीन्ही


प्रभु सन कह अति आरत वानी । दीनबंधु हे अंतरयामी

नाथ सकल  अपराध   विसारे । कुशल रहे सुहाग हमारे


ससुर जमाता घर को आवें । बहु विधि दोनों नाथ मनावें

पूजन से प्रसन्न भगवाना । मेटे अपने श्राप विधाना


चन्द्रकेतु को स्वप्न दिखाये । प्रभु स्‍वयं वहां प्रकटे जाये

नृप सन कहे सुनो हे राजा । करो मुक्त तुम ससुर जमाता


लौटावें उनके धन सारे । जो कछु उनके पास तुम्हारे

प्रातकाल आदेश सँवारे । होहिं हानि ना माने हमारे


राजपाठ धन धान्य पुत्र सब । सकल नशाही  नाहीं तो तब

चन्द्रकेतु सन सब बात कहे । सत्यदेव अन्तर्धान भये 


सोरठा

उठकर राजा प्रात, सभा कहे निज स्वप्न को ।

कहे सभा सद तात, छोड़ें बंदी वणिक जन ।। 


चौपाई

दूत मुक्त कर बंदी दोऊ । राजा सन्मुख लाये सोऊ

राजा को वे वंदन करते । उनके नयनों से जल झरते


चन्द्रकेतु आदर सहित कहे । सुनो साधु यह प्रारब्ध रहे

अब कुछ भय यहां नही भैया । मुक्त भये बंदीगृह छैया


नृप उनके बेड़ी कटवाये । क्षौरकर्म पूरा करवाये

आभूषण नूतन परिधाना । पहिरीवाये सह सम्माना


पहले से धन दूना कर के । दिये मधुर वाणी उर भर के

मुक्त साधु तुम सहित जमाता । निज गृह जाओ तुम हर्षाता


दोहा

राजा को करते नमन, हर्ष न हृदय समात ।

राजाज्ञा से साधु अब, अपने गृह को जात ।।


।।सत्यनारायण स्वामी की जय।।

।। कथामृत तृतीय अध्याय समाप्त।।


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