सत्‍यनाराण कथा हिन्‍दी पदानुवाद-4

 

सत्‍यनाराण कथा हिन्‍दी पदानुवाद-4



अध्याय -4


स्तुति (हरिगीतिका छंद) 


प्रभु दीनबंधु सदा रहो उर हाथ शंख गदा लिये ।

छवि मोहनी मुख मेघ श्यामल क्षीर सा मम उर किये ।।

प्रभु भक्त वत्सल हाथ लें धर मैं अबोध नदान हूॅं ।

भटकन भरी जग राह प्रभु पथ से अभी अनजान हॅू ।।


दोहा

सत्‍यदेव को याद कर,  किए भूल स्वीकार । 

वणिक साधु इस  मुक्ति को, माना प्रभु उपकार ।।


चौपाई

सत्यदेव की महिमा माना । उनके व्रत करने का ठाना

द्विजों को कुछ धन दान दिये । अपने घर को प्रस्थान किये


सत्‍यदेव प्रभु हृदय विचारी । साधु वचन संकल्‍प लबारी

साधु भक्ति प्रभु मन ही खटके । परखन दण्डी बन प्रभु प्रकटे


हे व्यापारी क्या नाव रखे । पूछत यह प्रभु उनको परखे

धन मद चूर महाजन दोऊ । दण्डी सन बिहसि कहे जोऊ


किस कारण पूछते हो साई ।  है क्या धन की इच्छा भाई

पत्र लता से यह नाव भरे । साधु जमाता उपहास करे


 निष्ठुर बोली उनके सुनकर । दण्‍डी स्‍वामी मन में गुनकर

प्रभु बोले उनके अनुहारे । सत्य होय यह वचन तुम्हारे


सत्‍यदेव वह दण्‍ड़ी रूपा। लीला करते विकट अनूपा

साधु वचन को सत्‍यहिं करते । उनके धन में माया भरते


इधर वणिक जन ससुर जमाता । नित्यकर्म करने को जाता

नित्‍यकर्म कर बदनहिं धोई ।  निरख नाव वे अचरज होई


रहा नाव जो भारी जल पर । साधु उसे देखा कुछ ऊपर

निकट गये वह नाव निहारी । सकल संपदा भय तृन झारी


दोहा

मूर्च्छित हो धरनी गिरे, वणिक महाजन साधु ।

उनके जब मुर्च्छा गये, चिंतित भये अगाधु ।।


चौपाई

देख दशा यह कहे जमाता । लगे श्राप दण्डी के ताता

त्याग शोक गहुँ उनके चरणा । मिटहिं क्‍लेश कछु संशय ना


बात जमाता सुन साधु चले । रहे जहां दण्डी बैठ भले

करत दण्डवत वह साधु कहे । क्षमा करे मम अपराध महे


बारहिं बार चरण धर माथा । रुदन करत हैं साधु जमाता 

देख उसे रोवत दण्डी प्रभु । कहे मुर्ख व्रत याद किये कभु


मेरी पूजन तुम छोड़ रखे । येही कारण ये कष्ट चखे

दण्‍ड़ी प्रभु की वाणी सुनकर । साधु हृदय में  अपने गुनकर


दुखित हुये अपराध बोध से । काँप उठा वह  देव क्रोध से

आतम ग्‍लानी से वह भरकर । करते स्तुति वह हाथ जोड़ कर


कामरूप छंद 

हे परम दयालु, दया कर दो,  शरण गहुँ कर जोर ।

आपकी  माया,  है फसाया,  मुझे बांधे डोर ।।

महिमा आपकी,  देव  सारे,  जान सके न थोर ।

हे  जगत  स्वामी,  मोह माया,  जान सकूँ न तोर ।।


दोहा

विविध  भांति  वह स्तुति करे, दया करें प्रभु आप ।

करिहँव मैं  व्रत   आप   के,   मेटें   प्रभु  संताप ।।


चौपाई

सुनकर उनके आरत वाणी । दया किए दीनों के दानी

दिए उन्हें  इच्छित वरदाना ।दण्‍डी प्रभु भय अन्तर्ध्याना


साधु नाव जा देखा चढ़कर। देखत वह चकित रहे  पल भर

लता पत्र पुनः धन धान्य हुये। देख साधु प्रभु जयकार किये


साधु दया यह प्रभु की पाकर। अपने सब परिजन बैठाकर ।

विधि पूर्वक कीन्हे व्रत पूजन। सुनते कथा सत्यनारायण 


दान दक्षिणा वह द्विजन दिये। रत्नपुरी फिर प्रस्थान  किये

नाना जतन नाव संभाले। चले नगर निज दूत हकाले


अपने नगर निकट जब पहुँचे। नगर दिखाये वह बहुत हर्षे

रत्नपुरी निज नगर सुहाये। देख साधु इक दूत पठाये


दोहा

दूत   साधु   के   पत्नि   से,   कहे  जोड़कर  हाथ ।

पहुँच रहे  हैं सेठजी,   लिये    जमाता    साथ ।।


चौपाई

विविध संपदा सेठ समेटे । सहित जमाता आये लौटे

नगर निकट आयें हैं पहुॅंचे। सुनी बात लीलावती हर्षे


होकर वह अति आनंद मगन। पूजन लगी सत्यनारायण

कलावती को वह समझाये । पति दर्शन को तुरते जाये


नाना विधि से देव मनाना । पूजा पाठ बाद तुम  आना

मात वचन सुन वह कलावती। सत्यदेव पूजन करे इती


यथा शीघ्र देखन अपने पति। प्रभु प्रसाद त्यागे कलावती

दौड़ पडी वह निज पति दर्शन । देव कृपा बिसरे तेही क्षण


दोहा

कलावती  के  भूल  से,  रुष्ट  भये  भगवान ।

सकल संपदा पति सहित, डूबे उनके यान।।


चौपाई

देखे ना अपने पति जब वह । धरा गिरी रोवत पति पति कह

साधु नाव अदृष्य कर जाना। कन्‍या दुखी देख भय माना


देखत अचरज करे विचारा। किस विधि अब होहिं उबारा

दुखी देख निज कन्या माता। कहे विहल पति सन विलपाता


प्रभु विलुप्त नाव भये कैसे। देखत प्राण तजे तन जैसे

किये कौन हम देव उपेक्षा। पूरा होते हुई न इच्छा


नाव सहित दामाद गवाये। देख दुर्दशा चित्‍त  हराये

कारण कुछ भी समझ न आवे। किस कारण हम सब दुख पावे

दोहा

सत्यदेव  की   शक्ति   को,   जान   सके   है   कौन।

उनकी  माया   देख   के,  रहे  देव   भी      मौन।।


चौपाई

विविध भांति मन किन्‍ह विचारा । लेकिन कुछ पाये ना पारा

कलावती निज पति ना पाये । नाना विधि वह दुखी मनाये


सती होन वह मन ही ठानी। चरण पादुका पति की लानी

कन्या का प्रण साधुहिं जाने। शोक मग्न मन अति अकुलाने


सत्यदेव ही यह किये हरण ।वणिक साधु निज उर किये मनन

उनकी माया इसको जाना । करन लगे वह प्रभु गुण गाना


अपने परिजन पास बुलाये । अरु कहि मन संकल्‍प सुनाये

सत्यदेव की करहँव पूजा । सत्यदेव सम नाहीं दूजा


साधु धरे श्रद्धा विश्‍वासा । छोड़े अब वह सकल निराशा

बार बार वह देव मनावे । अपनी आरत वचन सुनावे


दोहा

करुण व्यथा सुन साधु के, सत्‍यदेव कहि बात ।

आये भोग प्रसाद तज, सो फल कन्या पात ।।



चौपाई

भोग ग्रहण कर यदि वह आये । निश्चय निज पति दर्शन पाये 

गगन वचन यह सुनकर काना । कलावती मन अति हर्षाना


तुरतहिं अपने घर को धाई । श्रद्धा सहित भोग वह पाई

कर प्रसाद सेवन फिर आई । पति को सकुशल देख हर्षाई


हली-भली पति परिजन देखे । कलावती कह पिता सम्मुखे

चलो तात अपने घर चलते । क्यों करके अब विलम्ब करते


वचन साधु  सुनकर हृदय भरे ।  पूजन विधि विधान सहित करे

परिजन अरु संपदा बटोरी। अंतस प्रभु प्रति प्रीत न थोरी 


साधु रहे सुख अब पूर्वक घर । नित्य करे सुमिरन प्रभु उर धर

मास पूर्णिमा अरु संक्रान्तिहिं । कथ करावत पावत शांतहिं


दोहा

मृत्युलोक में साधु वह, करते नित सत काम ।

अंतकाल सतलोक में, पायो वह विश्राम ।।


।। सत्यनारायण स्वामी की जय।।

।। कथामृत चतुर्थ अध्याय समाप्त।।


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