सत्यनाराण कथा हिन्दी पदानुवाद-2
अध्याय -2
स्तुति
(कज्जल छंद)
हे प्रभु मेरे सत्य देव । कृपा दृष्टि से देख लेव
सतानंद के हरे पीर । विप्र रूप तुम धरे शरीर
लकड़हारा रहे दरिद्र। तेरे कृपा भये पवित्र
मेरे माथ फेरो हाथ । प्रभु सदा सदा रहो साथ
सोरठा
व्रत महिमा पश्चात, सूत कहे हे द्विज सुनो ।
प्रभु सुमरी हे तात, पूर्वकाल की कथा जो ।।
चौपाई
काशी नामक पुरी सुहावन । रहे जहां इक दीन ब्राह्मण
सदानंद रहे नाम उनका । क्लेश कष्ट से नाता जिनका
भूख प्यास से होकर व्याकुल । निशदिन भटके धरा भयातुर
विप्र दशा देखे जब भगवन । वृद्ध ब्राह्मण बन लगे कहन
हे द्विज किस कारण आप दुखी । मो सन कहिये हो बहिर्मुखी
किस कारण तुम भटके दर दर । कैसे जी रहे अहहह मर मर
सुन के विप्र कर्ण प्रिय बानी । बोले वचन करूण रस सानी
हे द्विजवर मै दीन हीन अति । मांगत भिक्षा घूमत जगती
हे द्विज कुछ उपाय तुम जानत । निर्धनता जाये तुम मानत
वृद्ध विप्र द्विज सन कहि बाता । सत्यदेव है सुफल प्रदाता
दोहा
उत्तम व्रत है देव के, मन में कर विश्वास ।
मुक्ति मिले हर कष्ट से, तज दुनिया के आस ।।
चौपाई
सत्यनारायण व्रत विधाना । रीत-नीत कहि कर भगवाना
अंतर्धान फिर वह वृद्ध भये। विप्र उपाय सुन हर्षित भये
मै करि हँव एहि भांति पूजा। और उपाय न अब है दूजा
प्रातः काल उठकर करे मनन । करि हँव व्रत सत्यनारायण
चले करन वह द्विज भिक्षाटन । देव कृपा से पाये बहु धन
प्रेम भाव सहित वह व्रत किये । सभी बंधु बांधव साथ लिये
सत्यदेव की महिमा भारी । अतुल संपदा दिये सुरारी
सकल कष्ट अरु मेटी क्लेशा । सूत कहे हे सकल मुनेषा
प्रति महिना वह व्रत लगे करन । निज उर धरे सत्यनारायण
सब पापो से वह मुक्त भये । अति दुर्लभ मोक्षपद को गये
दोहा
यह व्रत जो मनुष्य करे, पावे सुख आपार ।
कष्ट दीनता दुख मिटे, मिले परम उपहार ।।
श्री नारायण जो कहे, नारद जी के पास ।
बात सभी मैं कह गया , कहें और क्या आस ।।
चौपाई
सूत वचन सुन सब विप्र कहे । धन्य हुये हम हे ज्ञान महे
देव कथा व्रत यह अमोघ निधि । आप कहे प्रभु यह सहज विधि
उस द्विज के बाद यह व्रत कथा। कहें कौन जग में किये यथा
उनके अति प्रिय वाणी सुनकर । कहे सूतजी अंतस गुनकर
वही श्रेष्ठ द्विज एक बारा । व्रत कर रहे सहित परिवारा
तेही क्षण एक लकड़हारा ।। आये सिरलिये काष्ठ भारा
सूखे कंठ प्यास के मारे । लकड़ी भार द्वार पर डारे
उनके घर के भीतर आये । द्विज वैभव देखी हर्षाये
विप्र चरण वह किन्ह प्रणामा । सविनय पूछे यह क्या कामा
कहें लाभ प्रभु विधि विस्तारा । हरें विप्र मोरे मन भारा
दोहा
यह सत्यनारायण व्रत, करे मनोरथ पूर्ण ।
कहे विप्र हे बंधु सुन, पाया मैं परिपूर्ण।।
चौपाई
सुनत लकड़हारा मधुर वचन । अति हर्षित निज उर करे मनन
प्रभु प्रसाद अरू जल कर सेवन। चले नगर वह लकड़ी बेचन
चलत राह वह करि प्रभु सुमरन। करिहँव मैं व्रत सतनारायण
काष्ठ दाम जो कछु मैं पाऊँ। पूजन सामाग्री ले आऊँ
सोचत पहुँचे वह धनी नगर। दूना मूल्य पाये काष्ठ गठर
काष्ठवाह वह बहुत हर्षाया। व्रत सामाग्री घर ले आया
दुग्ध दही अरु शहद शर्करा । धूप-दीप अरु पुष्प दर्मरा
फिर मण्डप बहु भांति बनाये । परिजन के नेवता पठाये
चरण पखारी विप्र बुलाये । किन्ह देव पूजन वह मन लाये
परिजन मिलकर सब सुने कथा । दिये दक्षिणा वह शक्ति यथा
दोहा
प्रभु के व्रत प्रभाव से, पाये वह धन धान्य
जीवन भर सुख भोग के, सतपुर किये पयान
।।सत्यनारायण स्वामी की जय।।
।।कथामृत द्वितीय अध्याय समाप्त।।

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